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फ़ज़लुर्रहमान की यह कविता प्यार और ज़िन्दगी की सूक्ष्म भावनाओं का बखान करती है। इसमें इश्क़ का मौसम, तल्ख़ रातों की पीड़ा, और जीवन की संवेदनाएँ बारीकी से उकेरी गई हैं। कवि का अंदाज़ दर्शाता है कि मोहब्बत अचानक उत्पन्न होती है, निखरती है और इसकी खुशबू हमेशा महकती रहती है। Read More

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यह ग़ज़ल फ़ज़लुर्रहमान द्वारा लिखी गई है, जिसमें प्रेम, यादों और तन्हाई का असर दर्शाया गया है। कवि ने अपने दर्द और रूठी हुई यादों को साझा किया है, जिसमें रिश्तों की नाजुकता और खोए हुए आश्रयों का जिक्र है। रात की तन्हाई और आंखों की अनकही बातें ग़ज़ल की मुख्य भावनाएँ हैं।

असर बाक़ी है

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फ़ज़लुर्रहमान की यह शायरी असर बाकी है मोहब्बत, रिश्तों की नज़ाकत और इंसानी एहसासात को बयान करती है। इसमें मुलाक़ातों की तड़प, ख़्वाबों की बेचैनी और रिश्तों की मजबूती का पैग़ाम है। अशआर पाठक के दिल को छू लेने वाले हैं और मोहब्बत की गहराई को उजागर करते हैं।

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हंसी बच्चों की

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फ़ज़लुर्रहमान की ग़ज़ल “हंसी बच्चों की” इंसानियत, शर्म-हया और मासूमियत का संदेश देती है। इसमें लेखक ने समाज की बुराइयों और झूठे उसूलों पर तंज कसते हुए बच्चों की हंसी को सबसे बड़ी सच्चाई और पवित्रता बताया है।

वो हमारे आका हैं

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यह नात हमारे प्यारे आका ﷺ की करामात, रहमत और इंसानियत भरे जीवन को बयान करती है। चाँद को उँगली पर घुमाना, डूबे सूरज को पलटना, यतीमों को सहारा देना और बच्चियों को ज़िन्दा दफ़न होने से बचाना—ये सब उनकी रहमत की मिसालें हैं। शबे मेराज पर खुदा का बुलावा और महशर के दिन गुनाहगारों की शफ़ाअत करना उनकी महान शख्सियत को दर्शाता है।

गीतकार नहीं है

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फ़ज़लुर्रहमान की शायरी गीतकार नहीं है रिश्तों के टूटते जज़्बात, मोहब्बत की कमज़ोर पड़ती लौ और इंसान की बदलती शख्सियत को उजागर करती है। इसमें दर्द, तन्हाई और भरोसे की कमी को बेहद शायराना अंदाज़ में बयां किया गया है।

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ग़ज़ल

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फ़ज़लुर्रहमान की यह ग़ज़ल मोहब्बत, जुदाई, दर्द और हौसलों का संगम है। इसमें यादों की कसक, ज़िंदगी की उलझनें और गीतों में मोहब्बत का जन्म बख़ूबी बयान किया गया है। शायर ने ग़म के बीच तसल्लियों, तूफ़ानों में हौसलों और कलम की ताक़त को दिलकश अंदाज़ में पेश किया है।

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फ़ज़लुर्रहमान की यह ग़ज़ल दर्द, मोहब्बत, इबादत और इंसानी किरदार की हक़ीक़त को बयाँ करती है। इसमें बियाबां में पड़े बुतों, दिलों से गुज़रती अज़ानों और मोहब्बत में बेदलील सच्चाई का तज़किरा मिलता है। शायरी इंसान की रूह और समाज की सच्चाई को आईना दिखाती है।

रोज़ी हलाल रखता हूं

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फ़ज़लुर्रहमान की नज़्म ‘रोज़ी हलाल रखता हूं’ इंसान के ईमान, मोहब्बत और जद्दोजहद की कहानी बयां करती है। इसमें शायर अपने दर्द, सच्चाई, और आत्मसम्मान को बेबाकी से पेश करते हैं। वो दिखाते हैं कि कैसे मुश्किल हालात में भी रोज़ी हलाल कमाना, मोहब्बत निभाना और अपने जज़्बात को संभालना एक इंसान की असल पहचान है।

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ख़ुशी अंतहीन चाहिए

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यह शायरी फ़ज़लुर्रहमान की कलम से निकली एक गहरी सामाजिक और रूहानी सोच का प्रतिबिंब है। इसमें इंसान की अंतहीन खुशियों की तलाश, हर चेहरे पर मुस्कान की ख्वाहिश, और रूहानी इबादत की सच्चाई को शिद्दत से बयां किया गया है। शायर सत्ता, समाज और धार्मिक पाखंड पर सवाल उठाते हुए इंसानियत, रोटी, मकान और अमन की मांग करता है। शायरी का हर शेर सोचने पर मजबूर करता है कि…

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