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तू निखरती है

Jaipur

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ये आग धीमे धीमे कहां  सुलगती  है

सुलगने पे आतिशफिशां उगलती  है

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अब   इशारों  में मोहब्बत  नहीं होती

अचानक उपजती फिर  खनकती  है

प्यार  का   मौसम   तय  नहीं   होता

इसकी  खुशबू  ता  उम्र   महकती  है

तल्ख़ रातों  का  ज़िक्र  क्यों  न  करुं

पसे    दीवार     संग     सुबकती    है

ज़िन्दगी   छिप   के   देखती   है  मुझे

जैसे    चिलमन   कोई    सरकती   है

जिस  आईने  में   तुझे   देखा     लगा

दुश्मनी    में    भी    तू   निखरती   है

एक    सदमें   का    मुन्तजिर   हूं   मैं

घर   की   दीवार    भी    दरकती    है

शौर  अब  ख़त्म  हुआ  महफ़िल  का

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दुनियां   फ़ानी   है   कब   ठहरती   है

फ़ज़लुर्रहमान

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