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ग़ज़ल

Jaipur

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शहर में उसके जो आया लुटना था उसका लाज़िमी

इसका अब क्या करें लुटकर कोई जाता ना था

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लफ़्ज़ बढ़ियां छांट कर लाता था मेरे वास्ते

ज़ायका उसका मगर क्या करें भाता ना था

 

इक अंधेरी सी गुफ़ा में ढूंढ़ता था हर कोई

लड़ते थे आपस में कोई रोशनी लाता ना था

 

ज़िन्दगी के राज़ पोशीदा हैं अब तक दोस्तों

राज़ अपने पास रख लेता बताता ना था

 

रास्ते शफ़्फ़ाफ़ थे मंज़िल भी बिल्कुल साफ़ थी

रहबर भी मेरे साथ था रस्ता कहीं जाता ना था

 

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तख़लीक़ :- फ़ज़लुर्रहमान

सेवानिवृत्त सहायक सचिव

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