देश की राजनीति में मुस्लिम नेताओं का प्रभाव और प्रतिनिधित्व क्यों घट रहा है?
जयपुर, (रॉयल पत्रिका)। यह सभी जानते हैं कि देश में मुस्लिम नेताओं का महत्व लगातार घटता जा रहा है। साथ में जनसंख्या के अनुपात में मुसलमानों का विधानसभाओं और संसद में प्रतिनिधित्व भी घट रहा है। वैसे इसके एक कारण नहीं होकर अनेक कारण हैं जिनके कारण मुस्लिम नेताओं का देश की राजनीति में लगातार महत्व घट रहा है।
इनमें मुख्य है-

ध्रुवीकरण:- देश की राजनीति में वर्तमान में धर्म का बोलबाला होने लगा है। देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव अब शिक्षा, रोजगार एवं विकास के बाजार ध्रुवीकरण के आधार पर जीते जा रहे हैं। देश की राजनीति में अब विकास का मुद्दा कमजोर होता जा रहा है। देश के राजनीति में सबको साथ लेकर चलने की नीति का अभाव स्पष्ट देखा जा रहा है। ध्रुवीकरण की आड़ में योग्य से योग्य मुस्लिम उम्मीदवार आसानी से घर जाते हैं। जो बहुसंख्यक लोग मुस्लिम हितों की बात करते हैं ध्रुवीकरण के कारण वह भी चुनाव हार जाते हैं। शिक्षा, रोजगार एवं विकास की राजनीति के अभाव में मुस्लिम समुदाय के अलावा देश की आर्थिक स्थिति पर काफी प्रभाव पड़ रहा है।
विधायकों एवं सांसद जीत कर अपने समुदाय को भूल जाते हैं?
जितने भी राजनीतिक दल हैं, ज्यादातर ऐसे मुस्लिम नेताओं को पसंद करते हैं जो उनकी हां में हां मिलाकर चलते हैं। ऐसे नेता जो मुस्लिम समुदाय से ज्यादा राजनीतिक दलों के हितों का ज्यादा ध्यान रखते हैं उन्हें विधानसभा और लोकसभा का टिकट आसानी से मिल जाता है। जब यह मुस्लिम लीडर जीत कर आते तो है यह अपने राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि ज्यादा होते हैं और अपने समुदाय के हितों को नजर अंदाज करते हैं। ऐसे विधायकों और सांसदों को स्वयं मुस्लिम समुदाय हराने की कोशिश करता है। राजस्थान विधानसभा 2023 में करीब 7 से 8 मुस्लिम विधायक इसी कारण चुनाव हार गए।
राजनीति में अमीर नेताओं का प्रवेश-
मुस्लिम समुदाय में सबसे ज्यादा गरीबी है। राजनीतिक दलों में ईमानदार, गरीब एवं मेहनती कार्यकर्ताओं की पूछ ज्यादा नहीं बची है। राजनीतिक दल अब पैसे वालों या व्यवसायी लोगों को विधानसभा और लोकसभा का टिकट देते हैं। यह अमीर नेता जीत कर तो आ जाते हैं लेकिन अपने समुदाय का ध्यान नहीं रख पाते हैं। क्योंकि ऐसे नेता समझते हैं कि उनके राजनीति में सफलता उनका पैसा है। यही कारण है कि ऐसे जनप्रतिनिधि अपने समुदाय के जरूरी मुद्दों पर भी सदन में आवाज नहीं उठाते हैं। व्यावसायिक जनप्रतिनिधि एक नहीं सभी दलों से संपर्क रखता है। वह अपने व्यावसायिक हितों के लिए अपने समुदाय के मुद्दों से ज्यादा प्राथमिकता देता है। यही कारण है कि ऐसे मुस्लिम नेता मुसलमानों के नेता नहीं बन पाते हैं और अगली बार चुनाव हार जाते हैं। मुस्लिम क्षेत्रों में वर्तमान में सरकारी स्कूल, हॉस्पिटल, सामुदायिक केंद्र, पार्क, सड़के, सफाई का स्पष्ट अभाव देखा जा सकता है। यह स्थिति ऐसे नेताओं के कारण ही बनी है।
-मुस्लिम समुदाय में जातिवाद, गुटबाजी, राजनीतिक अज्ञानता
मुस्लिम समुदाय पहले एक साथ होकर एक राजनीतिक दल को वोट देता था। जिसके कारण समुदाय का महत्व बहुत ज्यादा हुआ करता था। लेकिन समय के साथ मुस्लिम समुदाय में राजनीतिक गुटबाजी, जातिवाद और धार्मिक फिरके भी राजनीति में प्रभाव डाल रहे हैं। दूसरी तरफ राजनीतिक जागरूकता नहीं होने के कारण इन गुटों के नेता मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक स्थिति को प्रभावित कर रहे हैं। मुस्लिम समुदाय में गरीबी ज्यादा होने के कारण बेरोजगार युवा पैसे लेकर किसी भी दल के साथ आसानी से जुड़ जाते हैं। ऐसी स्थिति में मुस्लिम लीडरशिप पनपने में मुश्किल खड़ी हो जाती है।
-संसद में मुस्लिम सांसदों का प्रतिनिधित्व
भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार मुसलमानों की जनसंख्या 14-15 प्रतिशत (22 करोड़) है, लेकिन लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व 5 प्रतिशत से कम रहा है। जनसंख्या के अनुपात में मुसलमानों को लगभग 75 सीटें लोकसभा में मिलनी चाहिए लेकिन वास्तव में यह संख्या 24-27 के बीच रही है।
1952 11 सांसद
1980 49 सांसद
2004 34 सांसद
2017 26 सांसद
2019 27 सांसद

2024 24 सांसद
सांसद और विधानसभाओ में मुस्लिम प्रतिनिधित्व घटने का और भी कई कारण है जिनमें विधानसभा और लोकसभा क्षेत्र का पुनर्गठन, कई राजनीतिक दलों में मुस्लिम वोटो का बंटवारा एवं हिंदूत्व का बोलबाला है। विधानसभा और लोकसभा क्षेत्र का पुनर्गठन नियमों के अनुसार नहीं करके मुस्लिम वोटर बांटने पर फोकस किया गया। यह देश की राजनीति का पक्षपातपूर्ण रवैया है।
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