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जातिजनगणना से किस राजनैतिक दल को फायदा होगा?

Jaipur

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  • पार्टियों के नाम पर जातियों के समूह बन रहे हैं
  • जनसंख्या ज्यादा होने के कारण ओबीसी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का राजनीति में दबदबा बढ़ सकता है
  • राजनीति में दबदबा रखने वाली पार्टियां हाशिये पर जा सकती हैं

जयपुर (रॉयल पत्रिका)। जाति जनगणना देश का चर्चित मुद्दा बनता जा रहा है। जाति जनगणना का विरोध करने वाली भाजपा ने आश्चर्यजनक रूप से देश में जाति जनगणना करवाने का ऐलान कर दिया। जबकि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल आदि पार्टियां लगातार जाति जनगणना की लम्बे समय से मांग करती आ रही हैं। मोदी सरकार ने जातिगत जनगणना की घोषणा तो कर दी है, लेकिन सवाल उठता है कि जाति जनगणना करवाने से भाजपा को कितना लाभ होगा और कितना नुकसान होगा? दूसरी ओर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी,  राष्ट्रीय जनता दल आदि पार्टियां जाति जनगणना की घोषणा के बाद जश्न मनाने की स्थिति में हैं और जातीय समूहों तक ले जाने की तैयारी कर रही है, जातियों के प्रतिशत के अनुसार आरक्षण बढ़ाने के लिए दबाव बनाने की कोशिश करने का प्रयास करेंगी। जाति जनगणना होने के बाद देश का राजनीतिक स्वरूप बदलने लगेगा। इसलिए यह अभी से कहना आसान नहीं है कि जातीय जनगणना से किस पार्टी को कितना फायदा और नुकसान होगा?

राजनीतिक पार्टियों में जाति समूह एकत्रित हो रहे हैं 

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देश में जैसे – जैसे संविधान और आरक्षण का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, देश में जातिवाद भी बढ़ता जा रहा है। अब तक करीब-करीब कांग्रेस और भाजपा में सवर्ण जातियों का वर्चस्व था। भाजपा में अभी भी सवर्ण जातियों का नियंत्रण है । जिसमें ब्राह्मण, वैश्य और राजपूत जातियां मुख्य हैं। कुछ ओबीसी और दलित जातियां भी जुड़ी हुई हैं।  लेकिन उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता कि भाजपा को कब छोड़ दें? कांग्रेस पार्टी में जैसे-जैसे राहुल गांधी का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है ब्राह्मण, वैश्य और राजपूत आदि सवर्ण जातियों का दबदबा कम हो रहा है और ओबीसी एवं दलित जातियों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। कांग्रेस अपने पुराने वोट बैंक की ओर लौट रही है। कांग्रेस में पहले ब्राह्मणों का अच्छा प्रभाव था, लेकिन अब उनका प्रभाव घटता जा रहा है। समाजवादी पार्टी में पिछड़े,  दलित और मुस्लिम जातियों के गठजोड़ पर राजनीति हो रही है। इसी तरह बिहार में राष्ट्रीय जनता दल में पिछड़ों,  यादवों, दलितों की राजनीति का बोलबाला है। ज्यादातर राजनीतिक दल विचारधारा से ज्यादा जातियों के गठजोड़ और उनके फायदे की राजनीति कर रहे हैं, लेकिन बात सभी राष्ट्रभक्ति की करते हैं।

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भविष्य की राजनीति 

देश में पिछड़ों, दलितों एवं आदिवासियों की जनसंख्या 80 प्रतिशत के करीब है। जिनको संविधान में आरक्षण मिला हुआ है। आरक्षित जातियां देर-सवेर एक होने के प्रयास में रहेंगी । यदि आरक्षण जारी रहता है तो इन जातियों का जल्दी राजनीति प्लेटफार्म तैयार हो सकता है। आरक्षित जातियों के नेताओं का पार्टियों में तेजी से वर्चस्व बढ़ता जाएगा ओर सवर्ण जाति के नेता राजनीति में कमजोर होकर सत्ता से बाहर हो सकते हैं, कयोंकि देश में सवर्ण जातियों की जनसंख्या मात्र 20 प्रतिशत से कम है। भविष्य में जातिगत जनगणना के आंकड़े आने के बाद आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा को बढ़ाया जा सकता है और सरकार के ज्यादा संसाधनों पर आरक्षित जातियों का अधिकार हो सकता है।

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