चार करोड़ की लागत से तैयार ट्रोमा सेंटर, रख रखाव के अभाव में कबाड़ बनता जा रहा
मोहम्मद अब्बास

सांचौर (रॉयल पत्रिका)। क्षेत्र से गुजरने वाले नेशनल हाइवे 68 पर भामाशाह के सहयोग से चार करोड़ की लागत से बना धमाणा सरहद में स्थित ट्रोमा सेंटर विभागीय उदासीनता के चलते बदहाली पर आंसु बहा रहा है। ट्रोमा सेंटर परिसर में एक साल पूर्व तैयार की गई ग्रीनरी रखरखाव के अभाव में नष्ट हो रही है। वही परिसर में लगाए गए पौधे भी पानी के अभाव में जल कर सुख गए है। हालांकि भामाशाह परिवार द्वारा ट्रोमा सेंटर में पानी की सुचारू व्यवस्था व ग्रीनरी को हरा-भरा रखने के लिए ट्यूबवैल की सुविधा के साथ-साथ ग्रीनरी में नियमित पानी देने के लिए ड्रीप सिस्टम भी लगा रखा था। लेकिन पिछले एक साल से ट्रोमा सेंटर के शुरूआत करने के बाद तैयार की गई ग्रीनरी सुखने के कगार पर है। वहीं पौधे भी जलने लगे है। वहीं विभागीय उदासीनता के चलते इस कदर उपेक्षाओं का शिकार है पिछले एक साल से न रिक्त पदों पर चिकित्सकों की नियुक्ति हो पाई और न ही सीटी स्कैन व आईसीयू वार्ड को ऑपरेट कर मरिजों को सुविधा दी गई, इतना ही नहीं विभागीय लाचारी के भेंट चढ़े ट्रोमा सेंटर का न तो नियमित रूप से विभाग के अधिकारी विजिट करते है और न ही प्रशासनिक अधिकारियों को भी ट्रोमा की विजिट रास आ रही है। ऐसे में हाइवे से सटा व जिला मुख्यालय से मात्र 6 किलो मीटर दूरी पर स्थित ट्रोमा सेंटर दूर्दशा का शिकार हो रहा है, ऐसे में ट्रोमा सेंटर में लगी एक करोड़ की सीटी स्कैन मशीन धूल चाट रही है। वहीं आपात स्थिति में आने वाले गंभीर मरीजों को सिटी, आईसीयू जैसी सुविधा होने के बावजूद हाई सेंटर पर रैंफर करने का खेल खेला जा रहा है।

ऐसे में अधिंकाश मरीजों का समय पर इलाज नहीं मिलने से जान जोखिम में रहती है। जिसकी जानकारी विभाग के अधिकारियों को होने के बावजूद भी गम्भीरता नहीं बरती जा रही है। वहीं 6 बेड के साथ आईसीयू वार्ड भी एक साल से उपयोग तक नहीं हुआ, विभागीय उदासीनता के चलते टेस्टिंग लैंब को ही विभाग के कार्मिको ने आशियाना बना लिया है। ऐसे में लैंब में रखा सामान भी खराब हो रहा है। लाखों की लागत से निर्मित लैंब अब ट्रोमा में लगे कार्मिकों के लिए नकारा हो गई है। – लैंब में बेड बिस्तर लगाकर विभाग के कार्मिक शयन कक्ष के रूप में उसका उपयोग कर रहे है। ऐसे में जॉच के लिए भामाशाह के द्वारा दी गई लाखों की मशीने धुल फाक रही है। ट्रोमा सेंटर में लगा प्रशासन व जिम्मेदार आँधकारी भी गायब रहते है। ऐसे में चिकित्सा विभाग द्वारा लगातार की जा रही उपेक्षा की बदौलत चार करोड़ की लागत से एक साल पूर्व तैयार हुआ ट्रोमा सेंटर रख रखाव व सुचारू रूप से संचालन के अभाव में कबाड़ बनता जा रहा है। विभाग की उदासीनता इस कदर हावी है कि प्रशासन भी उक्त मामले को लेकर अनजान बना हुआ है। हाइवे से सटे ट्रोमा सेंटर पर प्रतिदिन गम्भीर हादसों के मरीज इलाज के लिए आते है लेकिन सुविधाओं के अभाव में उन्हें निराश लौटना पड़ रहा है। ट्रोमा सेंटर में डायलिसिस मशीने भी कमरे में बंद पड़ी है, डायलिसिस मशीन एक साल से पॉलिथिन में पैक पड़ी धूल चाट रही है। ट्रोमा सेंटर में विभाग ने एक ऑर्थोपेडिक चिकित्सक के साथ 11 नार्सिंग स्टाफ की नियुक्ति की हुई है। इसके बावजूद गम्भीर हादसों में ट्रोमा सेंटर में आए एक भी मरीज को ना तो भर्ती किया गया है और ना ही उसको आईसीयू का लाभ दिया गया है। सुविधा होने के बावजूद विभाग की उदासीनता के चलते किसी भी प्रकार की सुविधा को मरीजों के लिए उपलब्ध तक नहीं कराया गया। जिससे चिकित्सा विभाग की भूमिका सवालों के घेरे में है।
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