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रूह अफज़ा और शरबत जिहाद!

Jaipur

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जयपुर, (रॉयल पत्रिका)। गर्मियों की तेज़ धूप में जब प्यास से गला सूखता है, तब अक्सर एक ही नाम जुबान पर आता है – रूह अफजा। यह गुलाबी लाल रंग का मीठा और ठंडक देने वाला शरबत केवल एक पेय नहीं, बल्कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लाखों परिवारों की यादों और परंपराओं से जुड़ा हुआ एक हिस्सा बन चुका है। इसकी कहानी सिर्फ स्वाद और ठंडक की नहीं, बल्कि इतिहास, बंटवारे, विरासत और एकता की भी है।

1907 में दिल्ली में भीषण गर्मी से लोग परेशान रहने लगे थे। उस वक्त कई लोग स्ट्रोक, डायरिया और डिहाइड्रेशन के चलते दम तोड़ रहे थे। जब यूनानी हर्बल चिकित्सा और हमदर्द दवाखाना के संस्थापक हकीम हाफिज अब्दुल मजीद ने इस शानदार शरबत का इजाद किया। गर्मी की वजह से बीमार पड़ रहे लोगों को हकीम अब्दुल मजीद रूह अफ़ज़ा की खुराक देने लगे। लू और गर्मी से शरीर को बचाने में रूह अफ़ज़ा बेहद शानदार साबित हुआ। उस दौर में दिल्ली की गर्मी से लोगों को राहत देने के लिए उन्होंने जड़ी-बूटियों, फलों, फूलों और पौधों की जड़ों से यह पेय बनाया। आज रूह अफ़ज़ा को भले ही शरबत के रूप में मार्केट में बेचा जा रहा है, लेकिन एक वक्त था जब इसे दवाई की तरह इस्तेमाल किया जाता था। इस टॉनिक को तैयार करने में खुर्फा के बीज, पुदीना, अंगूर, गाजर, तरबूज, संतरा, केवड़ा, खसखस, धनिया, पालक, कमल, लिली और गुलाब जैसी प्राकृतिक चीज़ों का इस्तेमाल किया गया। यह शरबत शरीर को लू से बचाने और गर्मी में तरोताजा करने के लिए बनाया गया था। रूह अफजा का नाम एक मशहूर फारसी और उर्दू के कवि नजीर अहमद ने रखा था, जो हकीम अब्दुल मजीद के करीबी दोस्त थे। फारसी में “रूह” का मतलब आत्मा और “अफजा” का मतलब ताज़गी या तरोताजगी देना होता है। यानी “रूह अफजा” का मतलब हुआ – आत्मा को ताज़गी देने वाला। इस शरबत का पहला लेबल 1910 में कलाकार मिर्जा नूर अहमद ने तैयार किया था और इसे मुंबई की बोल्टन प्रेस में छापा गया था। बाद में रूह अफजा की बोतलों को जर्मनी में डिजाइन करवाया गया। पहले यह शरबत शराब की बोतलों में आता था, फिर इसे कांच की बोतलों में बेचा जाने लगा, और अब प्लास्टिक की बोतलों में उपलब्ध है। हकीम अब्दुल मजीद के निधन के बाद उनके बेटे हकीम अब्दुल हामिद ने हमदर्द की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने कंपनी को आगे बढ़ाया और इसे एक ट्रस्ट के रूप में बदल दिया, जिसका मकसद समाज की सेवा करना था। लेकिन साल 1947 में जब भारत का विभाजन हुआ, तब यह कंपनी भी दो हिस्सों में बंट गई। हामिद भारत में रह गए और हमदर्द इंडिया को चलाते रहे, जबकि उनके छोटे भाई मोहम्मद सईद पाकिस्तान चले गए और वहां कराची में हमदर्द की नई शुरुआत की। इसके बाद साल 1971 में जब बांग्लादेश बना, तब हमदर्द की एक शाखा वहां भी शुरू हुई। आज रूह अफजा भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश – तीनों देशों में बहुत लोकप्रिय है, रूह अफजा न केवल रमज़ान का एक अहम हिस्सा है, बल्कि हर घर की गर्मियों की थाली का भी हिस्सा है। चाहे मेहमान आ जाएं या गर्मी में कुछ ठंडा पीने का मन हो, रूह अफजा अक्सर पहली पसंद होता है। इसे पानी, दूध, आइसक्रीम या फालूदा के साथ मिलाकर पीया जाता है। रूह अफजा की खास बात यह है कि इसमें शामिल जड़ी-बूटियां और फूल न केवल स्वाद बढ़ाते हैं बल्कि सेहत के लिए भी फायदेमंद माने जाते हैं। यह शरीर को डिहाइड्रेशन से बचाता है और गर्मी में राहत देता है। यही वजह है कि आज भी, आधुनिक पेय पदार्थों की भरमार के बीच, रूह अफजा अपनी एक अलग पहचान बनाए हुए है।

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  • शर्बत विवाद से रूहअफ़ज़ा की चर्चा ज़ोरों पर:

हाल ही में योग गुरु बाबा रामदेव ने रूह अफजा पर ‘शरबत जिहाद’ जैसा विवादास्पद बयान देकर कहा कि इसकी कमाई मदरसों और मस्जिदों में लगाई जाती है। इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आईं, लेकिन इसके बावजूद रूह अफजा की लोकप्रियता में कोई खास फर्क नहीं पड़ा। क्योंकि लोगों के लिए यह सिर्फ एक ब्रांड नहीं, बल्कि यादों से जुड़ी एक परंपरा है। आज हमदर्द लैबोरेट्रीज इंडिया न केवल रूह अफजा बनाती है, बल्कि इसके पास 600 से ज्यादा उत्पाद हैं और यह कंपनी 25 से अधिक देशों में अपना व्यवसाय करती है। वित्तीय वर्ष 2023-24 में कंपनी ने 1,843 करोड़ रुपये की कमाई की, जो इसके निरंतर विकास को दर्शाता है।रूह अफजा की कहानी हमें यह बताती है कि एक छोटे से दवाखाने में शुरू हुआ यह शरबत आज भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। इसमें वह मिठास है, जो न केवल गले को राहत देती है, बल्कि लोगों के दिलों को भी जोड़ती है। यही वजह है कि रूह अफजा, आज भी, सिर्फ एक शरबत नहीं बल्कि एक विरासत है।

  • रूह अफ़ज़ा की परंपरा और पतंजलि की रणनीति के बीच फंसे छोटे ब्रांड

भारत में शर्बत का उद्योग बहुत बड़ा और लोकप्रिय है। यहां कई देसी ब्रांड्स मौजूद हैं जैसे हमदर्द का रूह अफ़ज़ा शर्बत, पायोमा इंडस्ट्रीज का रसना, बैद्यनाथ का शंखपुष्पी शर्बत और कूलर शर्बत, मैप्रो का गुलाब शर्बत और लेमन बार्ली वाटर, जय गुरूजी का नींबू स्क्वॉश शर्बत, मेहसन्स का केसरिया बादाम ड्राई फ्रूट शर्बत और खस शर्बत, 777 का नन्नारी शर्बत, डाबर का शरबत-ए-आज़म, गुलाब्स की ठंडाई, श्रीजी का खस और काला खट्टा, कृष्णा हर्बल का बेल शर्बत, वेलनेस शॉट का शरबत-ए-गुलाब, आरके होम मेड का मसाला काला खट्टा और निशा’s का चंदन गुलजार शर्बत प्रमुख हैं। ये सभी ब्रांड्स गर्मी में शरीर को ठंडक देने वाले, पारंपरिक स्वाद से भरपूर और प्राकृतिक शुद्धता में विश्वास रखने वाले हैं। लेकिन इन सबके बीच रूह अफ़ज़ा की एक खास जगह है ये न केवल स्वाद के लिए, बल्कि एक परंपरा, एक विरासत के रूप में देखा जाता है। अब ऐसे माहौल में जब पतंजलि जैसी बड़ी कंपनी शर्बत के बाजार में कदम रखने की तैयारी कर रही है, तो रूह अफ़ज़ा जैसी स्थापित और ऐतिहासिक ब्रांड को सीधी चुनौती देना आसान नहीं होगा। इसका स्वाद, गुणवत्ता और उपभोक्ताओं से भावनात्मक जुड़ाव ही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

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  • छोटे ब्रांड्स पर असर

हालांकि, पतंजलि की एंट्री छोटे और स्थानीय शर्बत ब्रांड्स के लिए वाकई बड़ी चुनौती बन सकती है। वजह साफ़ है पतंजलि के पास एक विशाल उत्पादन नेटवर्क है, देशव्यापी वितरण प्रणाली है, और एक मज़बूत ब्रांड छवि भी है जो आयुर्वेद और प्राकृतिक उत्पादों से जुड़ी हुई है। इसके अलावा, पतंजलि अपने उत्पादों को आमतौर पर कम कीमत पर बेचती है। बड़े पैमाने पर उत्पादन के चलते उनकी लागत कम आती है, जिससे वो बाजार में किफायती दाम पर क्वालिटी उत्पाद पेश कर सकते हैं। ये वो चीज़ है जो छोटे ब्रांड्स के लिए करना मुश्किल है, क्योंकि उनके संसाधन सीमित होते हैं। छोटे ब्रांड्स, जिनके पास विज्ञापन का बजट सीमित होता है, इस प्रतियोगिता में पिछड़ सकते हैं।

  • शर्बत जिहाद” बयान और ब्रांड छवि

हाल ही में बाबा रामदेव ने एक विवादास्पद बयान दिया जिसमें उन्होंने “शर्बत जिहाद” जैसे शब्द का इस्तेमाल किया। उन्होंने दावा किया कि कुछ शर्बत ब्रांड्स अशुद्ध सामग्री का उपयोग कर रहे हैं। यह बयान उपभोक्ताओं के बीच भ्रम और भय पैदा कर सकता है, और पतंजलि की ब्रांड छवि पर भी असर डाल सकता है। हालांकि, रूह अफ़ज़ा जैसे लंबे समय से विश्वसनीय और प्रतिष्ठित ब्रांड को इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि लोगों का उस पर भरोसा गहराई से जुड़ा है। लेकिन नए और छोटे ब्रांड्स, जो पहले से ही बाज़ार में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसे बयानों से प्रभावित हो सकते हैं। एक ओर रूह अफ़ज़ा अपनी परंपरा और गुणवत्ता के दम पर अपनी जगह बनाए हुए है, वहीं पतंजलि की रणनीति और ब्रांड ताकत छोटे शर्बत निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। ऐसे में सवाल यह नहीं कि क्या पतंजलि रूह अफ़ज़ा को पछाड़ पाएगी, बल्कि यह है कि क्या छोटे-छोटे देसी ब्रांड्स इस प्रतियोगिता में टिक पाएंगे?

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