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एक हज़ार दिरहम की कीमत

Jaipur

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हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मुबारक रह. दौलतमंद शख़्स थे मगर अक्सर अपनी दौलत सदक़ा-ओ-ख़ैरात में ख़र्च कर दिया करते थे। एक दफ़ा सफ़र हज के दौरान उन्होंने एक पड़ाव पर एक लड़की को कूड़े के एक ढेर से मरी हुई बतख़ को ले जाते हुए देखा। अब्दुल्लाह इब्ने मुबारक ने लड़की से पूछा के उसने मेरी हूई बतख़ क्यूं उठाई है ? लड़की ने बताया के उसके वालिद के साथ बड़ी ना’इंसाफ़ी हुई है जिससे उनकी मौत भी हो गई है मेरे वालिद की सारी दौलत भी छीन ली गई और यह के अब वोह अपने‌ भाई के साथ रहती है।

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उसने बताया के कूड़े पर फैंके गये बचे खाने के अलावा उनके पास खाने तक को कुछ नहीं था और उसे मसला मालूम है के जिन हालात में हम दोनों बहन-भाई जी रहें उस में हमारे लिए मुर्दा जानवर खाना जाइज़ है। इब्ने मुबारक रह. ने अपने मुंशी से पूछा के सफ़र हज के लिए कितनी रक़म बची हुई है। मुंशी ने बताया के उनके पास एक हज़ार दरहम बचे हैं। इब्ने मुबारक ने मुंशी से कहा बीस दरहम रख लो जो हमें तुर्कमानिस्तान तक पहुंचने के लिए सफ़र ख़र्च काफ़ी होंगे, बाक़ी रक़म इस लड़की को दे दो। हम वापस घर लोट चलेंगे क्यूं के इससे हमें हज से ज़्यादा स़वाब हासिल होगा।

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