कुरैशी समाज में शरई तरीके से शादियों का बढ़ता चलन
दहेज, गार्डन और डिनर से मुक्ति
जयपुर,(रॉयल पत्रिका )। मुस्लिम समाज में कुरैशी बिरादरी के शादी समारोह के आयोजनों में दहेज प्रथा एवं फिजूल खर्ची पर अंकुश लगाने का चलन चल पड़ा है। इस सिलसिले में दूल्हा व दुल्हन पक्ष आपस में सहमति कर नो दहेज, नो डिनर, नो गार्डन की नीति को अपना रहे हैं। जिसके चलते मस्जिद में निकाह व आने वाले मेहमानों की खजूर व शरबत के साथ मेहमान नवाजी कर दुल्हन को घर से रुखसत कर शरई तरीका अपना रहे हैं। इस सिलसिले की शुरुआत जयपुर के झोटवाड़ा क्षेत्र निवासी बिजनेसमैन एवं वरिष्ठ समाजसेवी छुट्टन कुरैशी ने अपनी बेटी का निकाह इसी पैटर्न पर कर एक मिसाल कायम की थी। जिसके बाद शहर जयपुर व प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में यह चलन आम हो चला, जिसकी सर्वत्र प्रशंसा की जा रही है। इसी कड़ी में सोमवार 10 फरवरी को जयपुर के आदर्श नगर क्षेत्र में मस्जिद ए हमजा में मरहूम हाजी सलीमुद्दीन मेंबर के पोते एडवोकेट मोहम्मद सुआले कुरैशी तथा मरहूम हाजी कबीरूद्दीन की पोती आलिमा आयशा बानो का निकाह शरई तरीके से हुआ। निकाह की रस्म मुफ्ती ए जयपुर शहर मुफ्ती अमजद अली ने अदा करवाई। मस्जिद में निकाह के बाद तमाम मेहमानों को खजूर व शरबत पेश कर मेहमान नवाजी की गई। दूल्हे के पिता हाजी नईमुद्दीन व दुल्हन के पिता हाजी मोहम्मद इकबाल ने तमाम मेहमानों का तहे दिल से इस्तकबाल किया तथा सभी से आग्रह किया कि वे शादियों में फिजूल खर्ची पर पाबंदी लगाएं तथा बच्चों की तालीम पर खर्च करें।

वरिष्ठ जनों से पहल का किया आग्रह

वहीं दूल्हे एडवोकेट मोहम्मद सुआले कुरैशी के भाई मंजूर इलाही तथा दुल्हन आयशा बानो के भाई एवं वरिष्ठ युवा कांग्रेस नेता असरार अहमद कुरैशी ने कहा कि समाज में बढ़ती सामाजिक कुरीतियों के कारण बहुत सारी बच्चियों की शादी समय पर नहीं होने के कारण उनके घर वाले बड़े परेशान रहते हैं तथा कर्ज लेकर शादियां करते हैं, जो कि जीवन भर कर्ज के बोझ से दबे रहते हैं। समाज के वरिष्ठ जनों को चाहिए कि वे आगे आकर ऐसी पहल करें और फिजूल खर्ची पर पाबंदी लगाते हुए बच्चों की शिक्षा पर खर्च करें तथा शादियों में शरई तरीका अपनाते हुए नो दहेज, नो गार्डन, नो डिनर की नीति पर कार्य करें।
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