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ग़ज़ल

Jaipur

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इन पेड़ों के पत्तों पर अब भी बारिश का पानी है

आंखों की गीली कोरों में दिल की छिपी कहानी है

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फर्श तो सब चमकीले हैं दीवार पे काई छाई है

जंग आलूदा फ्रेमों में तस्वीरें कुछ  पहचानी है

हर सिम्त सदाओं का जंगल हर सिम्त नज़र पथराई है

जिन राहों पर हम साथ चले वो राहें अब अनजानी है

झील किनारे झुरमुट के साए में कोई तन्हा है

अक़्स तो डूबा लहरों में बाक़ी इक जान गवानी है

दुनिया के हाथों में पत्थर और दौड़ता साया राहों पर

खिड़की की बेबस नज़रों को अश्कों की नहर बहानी है

पत्थर के बुतों से पूछ लिया अंजाम हमारा क्या होगा

क़ातिल के मसीहा होने तक मर जाएं न दुनिया फ़ानी है

ख़्वाबों की चुभन ने आंखों से नींद को कौसों दूर किया

सहरी तारे के छिपने तक आंखों में रात गंवानी है

तख़लीक़:- फ़ज़लुर्रहमान

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सहायक सचिव (सेवानिवृत्त)

मोबाईल नं 9828668877

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