बिन ब्याहे अर्पण का
फ़ज़लुर्रहमान की यह कविता यौवन, प्रेम, तर्पण और जीवन के दर्शन को छूते हुए मनोवैज्ञानिक यात्रा प्रस्तुत करती है। इसमें अर्पण (समर्पण) और बिना विवाह के प्रेम संबंधों की उलझन, सावन में प्रेम की कथा, पूर्वजों के तर्पण का महत्व, लक्ष्मण रेखा का मिटना और महाकाव्य में दोष मिटाने की कठिनाई जैसी जीवन के विभिन्न बिंदुओं को शायरी के अंदाज़ में छूआ गया है। Read More
