मुसलमानो के नागरिक अधिकारों पर हमले जारी हैं?
एक तरफ संघ प्रमुख कहते हैं कि हिंदू मन से सांप्रदायिक नहीं होता है? वहीं दूसरी तरफ भाजपा की राज्य सरकारें लगातार मुसलमानो के नागरिक अधिकारों पर हमले कर रही है?

एक तरफ संघ प्रमुख मोहन भागवत कहते हैं कि हिंदू मन से सांप्रदायिक नहीं होता है। वहीं दूसरी तरफ भाजपा के राज्य सरकारें लगातार मुसलमानो के नागरिक अधिकारों पर हमले कर रही है। इसमें हैरान होने वाली बात इसलिए नहीं है क्योंकि फासीवादी विचारधारा में हमेशा कथनी और करनी में अंतर होता है। भ्रम फैलाने के लिए अलग-अलग लोगों को अलग-अलग जिम्मेदारियां दी जाती है। ताकि आम जनता उनके असली उद्देश्य को नहीं समझे। फासीवादी विचारधारा में एक व्यक्ति आपसी समानता और भाईचारे की बात करता रहता है। वहीं दूसरी तरफ जमीन पर वह अपने एजेंट के आधार पर काम करते रहते हैं। मुसलमानो के मामले में संघ और उससे जुड़े संगठन इसी नीति पर चलते हुए नजर आते हैं और मुसलमानो के खिलाफ नफरत फैलाने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। इसमें वह सारी संवैधानिक मान्यताओं को तार-तार कर देते हैं। भाजपा के एक विधायक खुलेआम घोषणा करते हैं कि यदि कोई हिंदू युवा मुस्लिम लड़की को फंसा कर शादी करता है तो उसको इनाम में पाँच लाख रुपए दिए जाएंगे। उनका यह भाषण नफरत फैलाने वाला है और सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट फैसला है कि समाज में नफरत फैलाने वाले बयानों पर संबंध राज्य की पुलिस स्वत संज्ञान लेकर ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करें और कानूनी कार्यवाही करें। लेकिन पुलिस उल्टा करती है ना तो खुद कोई कार्यवाही करती है बल्कि यदि कोई एफआईआर दर्ज करवाने भी जाता है तो पुलिस दर्ज नहीं करती है। बिहार के केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने तो सारी हदें पार कर दी उन्होंने अपने बयान में बिहार के पूरे मुसलमानो को ही हरामखोर कह दिया और कहा कि मुसलमानो ने नीतीश सरकार की सारी योजनाओं का लाभ तो उठा लिया है, लेकिन अब नीतीश की पार्टी को वोट नहीं दे रहे हैं। गिरिराज सिंह शायद भूल गए हैं के मुसलमान भी इस देश का नागरिक है और हर नागरिक की तरह हर सरकारी योजनाओं का लाभ उठाना उसका संवैधानिक अधिकार है। मैं कुछ और भाजपा शासित राज्य सरकारों के निर्णय का उदाहरण सामने रखता हूं जिससे साफ हो जाएगा कि भाजपा की राज्य सरकारें कैसे लगातार मुसलमानो के नागरिक अधिकारों पर हमलावर रही है। बात असम सरकार की करते हैं यहां का मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा जब भी मुंह खोलता है। उसके मुंह से मुसलमानो के लिए नफरत ही निकलती है। पहले उसने हजारों मुसलमानो के घरों को अवैध बताकर बुलडोजर चलवा दिये। फिर सैकड़ो मदरसों को बंद कर दिया। अब असम के बांग्ला भाषी भारतीय मुसलमानो को विदेशी साबित करने की साजिश कर रहा है। उसके लिए 1950 का इमीग्रेशन एक्ट को हथियार बना रहा है। यह एक्ट भारत के विभाजन के समय इसलिए बना था कि बांग्लादेश के पूर्वी पाकिस्तान के मुसलमान भारत में न आ पाये। लेकिन कुछ महीने बाद ही नेहरू जी के समझ में आ गया कि यह एक्ट धर्म के आधार पर भेदभाव करने वाला है। कोई भी धर्म का मानने वाला अगर भारत में रहना चाहता है तो उसे आने देना चाहिए और इस एक्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अब इसको हथियार बनाकर हेमंत बिस्वा शर्मा की कैबिनेट ने एक (एस ओ पी) योजना लागू की है। स्ट्रैंड आफटेरिंग प्रोसीजर। इसमें किसी भी बांग्ला भाषी पर शक हो जाता है कि यह विदेशी है तो कोई भी उसकी शिकायत जिला कमिश्नर को कर सकता है। जिला कमिश्नर उस व्यक्ति को नोटिस देगा और उसे 10 दिन मैं अपनी नागरिकता साबित करनी होगी और नागरिकता साबित करने के लिए कौन से दस्तावेज मानने होंगे इसका कोई उल्लेख नहीं है। यानी सब मुद्दा कमिश्नर के हाथ में है यदि कमिश्नर संतुष्ट नहीं होता है तो उसको सीधा हार्डीग सेंटर में भेज दिया जाएगा, और फिर बांग्लादेश डिपोर्ट कर दिया जाएगा। उसे सुनवाई का कोई मौका नहीं दिया जाएगा। कर्नाटक के संग से जुड़े हिंदूवादी संगठनों ने तो गजब ही कर दिया। कर्नाटक में सरकार अपने सरकारी धन से मैसूर में चामुंडा माता में विशाल दशहरे का आयोजन करती है। कर्नाटक सरकार ने इस बार इस दशहरे के आयोजन में कन्नड़ लोक लेखिका सुश्री बानू मुश्ताक को मुख्य अतिथि बनाने का फैसला किया था। क्योंकि वह कन्नड़ भाषा की पहली लेखक या लेखिका हैं। जिन्हें कन्नड़ साहित्य में विश्व प्रसिद्ध बुकर अवार्ड से सम्मानित किया गया है। राज्य सरकार के इस फैसले के विरोध में हिंदूवादी संगठन कर्नाटक हाईकोर्ट चले गए और दलील दी की दशहरा हिंदुओं का त्यौहार है। इसलिए किसी मुस्लिम को इसमें मुख्य अतिथि नहीं बनाया जाये। अब कर्नाटक हाईकोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया। तो यह लोग सुप्रीम कोर्ट चले गए और वहां भी यही दलील दी। तब सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा कि दशहरे का आयोजन सरकार करती है, और उसके आयोजन में सरकारी धन खर्च होता है, और सरकार के संविधान के अनुसार सरकार का कोई धर्म नहीं होता है। सुश्री बानू मुश्ताक को इस आयोजन में मुख्य अतिथि बनाना उचित और संवैधानिक फैसला है। इस प्रकरण से आप समझ सकते हैं कि मोहन भागवत जी के संगठनों से जुड़े लोगों का हिंदू मन सांप्रदायिक है या नहीं। यूपी में तो पुलिस ने गजब ही कर दिया। कानपुर में ईद मिलादुन्नबी के जुलूस में कुछ युवाओं ने आई लव मोहम्मद के बैनर लगा दिए। तो कुछ हिंदूवादी संगठनों ने विरोध किया और थाने चले गए और पुलिस 8 नामजद और कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया। जब यह मुद्दा राष्ट्रीव्यापी बन गया और पूरे देश में पूछा जाने लगा कि आई लव मोहम्मद भारतीय दंड संहिता की कौन सी धारा का उल्लंघन हुआ है। पूरे देश में लाखों लोगों ने अपने फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्टेटस में आई लव मोहम्मद लिखना शुरू कर दिया। तो कानपुर पुलिस बैकफुट पर आ गई और सफाई देने लगी की एफ आई आर तो टेंट के अतिक्रमण की है। अब जरा सोचिए कि अगर यह मामला सोशल मीडिया में ट्रेंड नहीं करता तो कानपुर पुलिस 10, 20 मुसलमानो को जेल में डाल चुकी होती। इस घटना से पता चलता है कि कैसे भाजपा शासित राज्यों में पुलिस का भी सांप्रदायिक करण हो गया है और इन राज्यों की पुलिस भी कैसे देश के मुसलमानो के नागरिक अधिकारों पर हमले कर रही है। मध्य प्रदेश में तो जैसे कानून का राज बचा ही नहीं है। इंदौर में एक कपड़ा बाजार है शीतला माता बाजार इस बाजार में सिर्फ महिलाएं ही खरीदारी करने आती हैं। इंदौर के विधायक पुत्र एकलव्य सिंह गौड़ ने फरमान जारी कर दिया कि दुकानदार अपने सभी मुस्लिम सेल्समैनों को नौकरी से निकालें। क्योंकि उनकी वजह से लव-जिहाद बढ़ रहा है और हैरानी की बात है दुकानदारों ने इस फरमान को मानते हुए सभी मुस्लिम सेल्समैनों को नौकरियों से निकाल दिया है। अब मोहन भागवत जी को बताना चाहिए कि उनके संगठनों से जुड़े लोगों के हिंदू मन में क्या है? राजस्थान के भीलवाड़ा में तो अजब वाक्य हुआ। कुछ लोगों ने अपने ठेलो पर वेज बिरियानी लिखा हुआ था। तो हिंदूवादी संगठन पुलिस के साथ पहुंच गए और कहने लगे बिरयानी मुस्लिम शब्द है। इसलिए बिरयानी की जगह वेज पुलाव लिखो। अब अनपढ़ों को कौन समझाएं की वेज भी और पुलाव भी दोनों ही तुम्हारे शब्द नहीं है। लेकिन यह सब मुसलमानो से नफरत करने के कारण कर रहे हैं। अगर हम सारी घटनाओं का विश्लेषण करें तो एक ही नतीजा निकलता है कि भाजपा शासित राज्य सरकारों में मुसलमानो के नागरिक अधिकारों को कुचला जा रहा है।

डॉ. एस खान
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