दरगाह हजरत मख्दुम पीर डाडा अब्बनशाह र.अ. का सालाना उर्स 31 मार्च को
- उर्स मुबारक को लेकर तैयारीया जोरों पर, कौमी एकता की प्रतिक दरगाह पीर की जाल
मोहम्मद अब्बास
सांचौर, (रॉयल पत्रिका)। उपखण्ड मुख्यालय से मात्र 7 कि.मी. पर स्थित अल मशहूर दरगाह हजरत मख्दुम पीर डाडा अब्बनशाह रे.अ. पीर की जाल पर वार्षिक उर्स (मैला) दिनांक 31 मार्च से 6 अप्रैल तक आयोजित होगा। जिला कलक्टर आदेशानुसार दरगाह पीर की जाल मैले में कानून व्यवस्था एवं लोक-शांति बनाये रखने हेतु उपखण्ड मजिस्ट्रेट सांचौर को मेला मजिस्ट्रेट तथा इनके सहयोग के लिए तहसीलदार सांचौर को सहायक कार्यपालक मजिस्ट्रेट नियुक्त किया गया। उर्स मुबारक को लेकर तैयारीया जोरों पर। दरगाह खादीम एडवोकेट ईब्राहीमशाह ने बताया कि दरगाह शरीफ के उर्स मुबारक को लेकर की जाने वाली तमाम व्यवस्था के बारे अवगत करवाया। दरगाह शरीफ को चारों और रंग बिरगी लाईटों से सजाया जाएगा। उर्स मुबारक में लगने वाली दुकानों को 25 मार्च को मैला दुकाने आंवटन की जायेगी। 31 मार्च को नेजा (झण्डा) की रस्म होगी। 03 अप्रैल को संदल होगा। 06 अप्रैल को उर्स समापन की रस्म अदा होगी। डाडा के उर्स मुबारक में सैकड़ो जायरीन दरगाह पर आते है हजारों जायरीन पैदल चलकर आते है पैदल आने वाले जायरीनों के लिए दान दाताओं की तरफ से जगह-जगह पर केम्प लगाकर पैदल जायरीनों के लिए चाय, पानी, नास्ता, दवाईया आदि की व्यवस्था की जाती है। दरगाह शरीफ के बुंलद दरवाजे से लेकर पुरी दरगाह शरीफ को रंग बिरंगी सजावट से सजाया जाएगा। सालाना उर्स में करीब 400-450 दुकाने लगती है जिसमें राजस्थान के गंगानगर, उदयपुर, अजमेर, पाली, नागौर, जालौर, बाड़मेर, जैसलमेर, भरतपुर, अलवर के अलावा इन्दौर, मध्यप्रदेश, गुड़गाँव, बम्बई, बरेली, फिरोजाबाद, कानपुर, उतरप्रदेश, पंजाब व गुजरात आदि राज्यों की दुकानें लगती है। रात्रि में इशा की नमाज के बाद उलमाए किराम के द्वारा नुरानी तकरीर का प्रोग्राम होता है, बाद में देर रात तक राजस्थान व गुजरात के मशहुर कव्वालों द्वारा सुफीयाना कलाम पेश किये जाते है। हजरत मख्दुम पीर डाडा अब्बनशाह रे.अ. का जन्म सिन्ध प्रांत के हाला शहर में हुआ था। अखण्ड भारत के समय में आप ने प्रतापपुरा के घने जंगल में रात्रि में विश्राम किया। सुबह में उठकर जाल की लकड़ी का दातुन किया और जमीन में गाढ़ दिया। तब साथ में मुरीदों को कहा कि यह मिस्वाक (दातुन) से तीन दिन में हरी पत्तिया निकलेगी। यह कह कर पड़ोस के गाँव वारा में चले गये। जहा पर आप रूके और तीन दिन के बाद आप ने मुरीदों को देखने के लिए यहाँ वापस भेजे तो दातुन की हुई लकड़ी से हरी पत्तिया निकल आई थी। आप ने साथ मुरीदों को वसीयत की के कही भी मेरा इंतकाल हो जाये। मुझे इसी जाल के नीचे मेरी मजारे पाक बनाना कुछ वर्षों के पश्चात आप की वफात वारागॉव (गुजरात) में हुई। आप को वही पर गुस्ल दिया गया। तथा इसी जाल के नीचे आप की मजारें पाक बनी है। उसी दिन से इस स्थान का नाम पीर की जाल पड़ा। एक के बाद एक इनके खानदान से आते रहे। इसी तरह इस जाल के नीचे चार मजारें बनी हुई है। कौमी एकता की प्रतीक पीर की जाल पर हर मजहब के लोग आते है। भूतप्रित और बिमारीयों से लिप्त लोगों का सच्ची आस्ता के साथ जाल वाले बाबा के आस्ताने की खाक के सेवन करने पर लाइलाज बिमारीयों का इलाज हो जाता है। दिल से आस्ता रखने वालों आम लोगों को बे हिसाब फायदे हो रहे है। इस दरगाह पर कोई किसी तरह की जात-पात नहीं सभी धर्म के लोगों के आस्था का केन्द्र जिले में दरगाह पीर की जाल मशहूर है।
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