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बिहार में एक भी मुस्लिम नेता मुख्यमंत्री का दावेदार नहीं

जयपुर

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बिहार में करीब 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी

जयपुर (रॉयल पत्रिका)। बिहार विधानसभा 2025 में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रहने वाली है। बिहार विधानसभा 2020 में आरजेडी और जेडीयू ने मिलकर चुनाव लड़ा था। जिसमें मुस्लिम मतदाताओं ने आरजेडी और जेडीयू का समर्थन किया था। नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। बिहार में आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव ने यादव मुस्लिम गठबंधन मजबूत किया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन पिछले चुनाव की तरह चाहते हैं। प्रशांत किशोर की पार्टी जनस्वराज भी बिहार के सत्ता में आने के लिए मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन चाहती है। प्रशांत किशोर ने दर्जनों मुस्लिम उम्मीदवार बिहार विधानसभा में उतारने का ऐलान किया है। लेकिन किसी गठबंधन एवं पार्टी ने मुस्लिम को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित नहीं किया है। जबकि बिहार में मुस्लिम समुदाय किसी भी जाती वर्ग से ज्यादा संख्या में है। बिहार में यादव, कुर्मी, ब्राह्मण एवं दलित नेता मुख्यमंत्री के दावेदार हैं लेकिन एक भी मुस्लिम नेता मुख्यमंत्री का दावेदार नहीं है।

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मुस्लिम नेता क्यों नहीं है मुख्यमंत्री के दावेदार-

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बिहार में आरजेडी, जेडीयू, कांग्रेस, लोकजनशक्ति पार्टी, जनस्वराज पार्टी आदि सभी मुसलमानों के वोट लेना चाहती है और मुस्लिम को वोट बैंक समझती है। लेकिन यही पार्टियां किसी मुस्लिम नेता को ज्यादा ना तो तरजीह देती है और ना ही मुख्यमंत्री बनाना चाहती है। भाजपा एक मात्र ऐसी पार्टी है जो मुस्लिम मतदाताओं के भरोसे नहीं रहती हैं। लेकिन मुस्लिम विरोध की राजनीति के चलते फायदा पूरा उठाती है। दूसरा कारण है कि बिहार में कोई भी मुस्लिम कददावर नेता नहीं है और राजनीतिक दल अपनी पार्टियों में कोई कददावर नेता पनपने भी नहीं देती है। बिहार में मुस्लिम भी अगड़े और पिछड़ी जातियों में बंटे हैं। पिछड़ी जातियों में नेताओं की कमी है और अगड़े मुस्लिम नेताओं को राजनीतिक दल आगे नहीं बढ़ाते हैं। बिहार में मुसलमानो की आर्थिक, शैक्षणिक एवं सामाजिक पिछड़ापन भी उनको राजनीति में महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचने में रुकावट है। इसलिए बिहार में मुस्लिम हमेशा की तरह किंग मेकर बने रहेंगे लेकिन किंग बनना सपना ही रहेगा।

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